Monday, 6 November 2017

अपनी मेहनत से दूर की इन भारतीय क्रिकेटर्स ने गरीबी, कोई वॉचमैन रहा तो कोई था मजदूर

अपनी मेहनत से दूर की इन भारतीय क्रिकेटर्स ने गरीबी, कोई वॉचमैन रहा तो कोई था मजदूर
इरादों में यक़ीन रखिये, इरादों में जान होती है 
पंखो से कुछ नहीं होता, होंसलों से उड़ान होती है। 


जैसे सोने की परख अग्नि करती है वैसे ही व्यक्ति की परख दुःख करता है। अधिक पैसा अमीर से अमीर व्यक्ति को भी लाचार बना सकता है। वहीं कुछ लोग तंगी में भी हीरे की तरह चमक उठते हैं। यहाँ हम किसी बड़े बिजनेसमैन कि सफलता की कहानी नहीं सुना रहे दरअसल हम बात कर रहे हैं उन लोगों की जिनको हम अकसर फील्ड में पसीना बहाते हुए देखते हैं।
जो यदि अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो सभी वाह वाही करते हैं और जब अच्छा प्रदर्शन कर पाने में असफल होते हैं तो इन्हें जनता के गुस्से का शिकार भी बनना पड़ता है। जी हाँ! हम बात कर रहे हैं भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों की। 
आप जानते हैं उन भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों के बारे में जो उस गरीबी से निकले हैं जहाँ सपने भी दम तोड़ देते हैं।

रविन्द्र जडेजा 

रविन्द्र जडेजा 
भारत के बेहतरीन ऑल राउंडर 'रविन्द्र जडेजा' आज जो भी हैं अपनी मेहनत के दम पर हैं। शुरू के दिनों में चौकीदार रहे 'रविन्द्र जडेजा' को देख मुह से यही निकलता है कि 'हौंसले और मेहनत किसी भी परिस्थिति के गुलाम नहीं होते।' आपको बता दें की रविन्द्र जडेजा के पिता भी एक चौकीदार थे। 

उमेश यादव, गेंदबाज़ी में ही नहीं सपनो में भी थी गति 

उमेश यादव, गेंदबाज़ी में ही नहीं सपनो में भी थी गति 
उमेश यादव के हाथों में जब गेंद नहीं हुआ करती थी तब भी उनकी आगे बढ़ने की गति धीमी नहीं थी। नागपुर में जन्मे उमेश यादव का परिवार बेहद ही गरीब था। परिवार चलाने के लिए 12वीं के बाद पिता के साथ मजदूरी करने वाले उमेश यादव ने मजदूरी को अपने सपनों के आगे नहीं आने दिया। यह अपनी मेहनत और लगन से आगे बढ़ते गए और आज के समय में भारतीय क्रिकेट टीम में उनसे अधिक गति वाला दूसरा कोई गेंदबाज़ नहीं है। 

पठान बंधू 

पठान बंधू 
इरफ़ान पठान और यूसुफ पठान दोनों का ही नाम दुनिया जानती है। दोनों का बचपन कुछ खास नहीं बीता, बड़े होते ही दोनों अपने पिता के साथ मस्जिद की देख-रेख का काम करने लगे। हालांकि दोनों भाइयों ने मस्जिद के गलियारों को ही अपनी पिच बना लि थी और वहीं प्रैक्टिस किया करते थे। फिर ज़्यादा समय नहीं लगा जब दोनों को दुनिया में पहचान मिल गई। 

कामरान खान, किसान से आईपीएल का सफर 

कामरान खान, किसान से आईपीएल का सफर 
कामरान खान ने गरीबी के वो दिन भी देखे हैं जब उनके पास रहने के लिए घर तक नहीं था। रेलवे स्टेशन पर रात गुज़ारने वाले इस युवा खिलाड़ी को अपनी मेहनत का फल तब मिला जब वो 18 साल का था। 18 की उम्र में कामरान के सर से गरीबी के बादल हट गए, उन्हें राजस्थान रॉयल्स ने 15 लाख रूपए में खरीद लिया। आईपीएल के चयन से पहले कामरान ने इलाज के लिए पैसे न होने की वजह से अपनी माँ को खो दिया था। 

मनोज तिवारी 

मनोज तिवारी 
जहां मनोज तिवारी को भारतीय टीम कि रोशनी की तरह देखा जा रहा है, वहीं मनोज तिवारी के अतीत पर नज़र डाली जाये तो आँखों में पानी भर आता है। सफलता के लिए मनोज तिवारी ने अपने हर एक क्षण का सदुपयोग किया है। यह रेलवे स्टेशन पर काम किया करते थे और क्रिकेट की शिक्षा दिलाने के लिए घर वालों के पास पैसे नहीं थे। मनोज के बड़े भाई ने लोन लेकर क्रिकेट क्लब में मनोज का दाखिला करावाया था। मनोज उस लोन का कर्ज अपने प्रदर्शन से अदा कर रहे हैं।  

भुवनेश्वर कुमार 

भुवनेश्वर कुमार 
जहाँ भुवनेश्वर कुमार के बिना भारतीय बॉलिंग अधूरी सी लगती है, वहीं एक समय था जब भुवनेश्वर कुमार के पास पहनने को जूते तक नहीं थे। क्रिकेट के लगाव ने उन्हें सब ही कठिन परिस्थियों से बाहर निकाला और आज के समय में यह भारतीय गेंदबाज़ी की अहम कड़ी हैं । 

मुनाफ पटेल 

मुनाफ पटेल 
हम सभी मुनाफ पटेल को एक तेज गेंदबाज़ के रूप में जानते हैं। लेकिन बहुत कम लोग ही हैं जो मुनाफ पटेल के अतीत से वाकिफ हैं। मुनाफ को क्रिकेट के आलावा सिर्फ मेहनत करना ही आता था इसलिए शुरआती दिनों में घर चलाने के लिए उन्हें मजदूरी का सहारा लेना पड़ा। मुनाफ आज जो भी हैं अपनी लगन और मेहनत के जज़्बे की वजह से हैं। 
जिनके इरादे मेहनत की सियाही से लिखे होते हैं, उनकी किस्मत के पन्ने कभी खाली नहीं होते। 

No comments:

Post a Comment